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भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अलग-अलग रथों में सवार होकर गुंडिचा मंदिर जाएंगे
पुरी में आस्था का सैलाब
ओडिशा के पुरी में विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथयात्रा निकल रही हैं। भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अलग-अलग भव्य रथों में विराजमान होकर मुख्य मंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे। लोक परंपरा में गुंडिचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर माना जाता है।
सात दिन मौसी के घर, फिर होगी बहुड़ा यात्रा
तीनों देवता गुंडिचा मंदिर में सात दिन प्रवास करेंगे। इसके बाद 24 जुलाई को बहुड़ा यात्रा के तहत वापस श्रीमंदिर लौटेंगे। लौटने के बाद भी भगवान दो दिन तक रथों पर विराजमान रहेंगे और 27 जुलाई को पुनः मंदिर में प्रवेश करेंगे।
रथ बनते हैं हर साल, बिकते भी हैं इनके हिस्से
रथयात्रा समाप्त होने के बाद मंदिर प्रशासन रथों को खोलने की प्रक्रिया शुरू करता है। बाद में इनके कुछ हिस्सों की बिक्री भी की जाती है। वर्ष 2025 में भगवान जगन्नाथ के रथ के एक पहिए की न्यूनतम कीमत 3 लाख रुपये, बलभद्र के रथ के पहिए की 2 लाख रुपये और सुभद्रा के रथ के पहिए की 1.5 लाख रुपये तय की गई थी।
13 तरह की लकड़ियों से तैयार होते हैं रथ
हर वर्ष नए रथ तैयार किए जाते हैं। इनके निर्माण के लिए ओडिशा वन विभाग मंदिर प्रशासन को 13 प्रकार की लकड़ियां उपलब्ध कराता है। इनमें फासी, धौरा, आसन, सिमिली, साल, गम्भारी, कदंब और देवदारु जैसी प्रजातियां शामिल हैं। भविष्य में लकड़ी की कमी न हो, इसके लिए राज्य सरकार विशेष वन परियोजना भी चला रही है।
बसंत पंचमी से शुरू होता है निर्माण
रथ निर्माण की शुरुआत बसंत पंचमी पर लकड़ियों की पूजा से होती है। रामनवमी के बाद कारीगर पारंपरिक तकनीक से रथ तैयार करना शुरू करते हैं। पहले पहिए बनाए जाते हैं और फिर पूरे रथ का ढांचा तैयार होता है। खास बात यह है कि रथ बनाने में पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक नाप-तौल की विधि का ही इस्तेमाल किया जाता है।
यात्रा से पहले होती है सुरक्षा जांच
रथ तैयार होने के बाद सरकारी इंजीनियर पहियों, धुरी, लकड़ी के जोड़ और पूरे ढांचे की जांच करते हैं। फिटनेस प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही रथों को यात्रा के लिए तैयार माना जाता है।
पहांडी और छेरा-पहरा की अनूठी परंपरा
रथयात्रा के दिन सबसे पहले भगवान सुदर्शन, फिर बलभद्र, सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ को झूमते हुए मंदिर से बाहर लाया जाता है। इस परंपरा को 'पहांडी' कहा जाता है। इसके बाद पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से तीनों रथों की सफाई कर सुगंधित जल का छिड़काव करते हैं। इस विशेष सेवा को 'छेरा-पहरा' कहा जाता है।
हजारों हाथ खींचते हैं भगवान का रथ
यात्रा के दौरान सबसे आगे बलभद्र, फिर सुभद्रा और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ चलता है। हजारों श्रद्धालु मोटी रस्सियों से इन रथों को करीब दो किलोमीटर तक खींचकर गुंडिचा मंदिर पहुंचाते हैं। यही दृश्य हर साल इस भव्य रथयात्रा को दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में शामिल करता है।