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उत्तराखंड की आध्यात्म और धार्मिक पहचान के सच्चे सेवक श्रीनिवास पोस्ती जी का 15 फरवरी 2026 को निधन हो गया
स्मृति शेष: श्रीनिवास पोस्ती
15 फरवरी 2026 को उत्तराखंड की आध्यात्म और धार्मिक पहचान के सच्चे सेवक श्रीनिवास पोस्ती जी का निधन हो गया। उनके जाने से केदारघाटी ने अपना एक अभिभावक खो दिया। हिमालय की गोद में बसे बाबा केदारनाथ का धाम न केवल श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपराओं और तीर्थ पुरोहितों के त्याग की कहानियों से भी जीवित है। जब भी केदारनाथ के आधुनिक इतिहास और वहां की व्यवस्थाओं की चर्चा होगी, श्रीनिवास पोस्ती का नाम सबसे अग्रिम पंक्ति में लिया जाएगा। वे केवल एक पुरोहित नहीं, बल्कि केदारघाटी की धार्मिक और सामाजिक चेतना के स्तंभ थे।
प्रारंभिक जीवन और पुरोहिती परंपरा
श्रीनिवास पोस्ती का जन्म उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के लमगौण्डी (गुप्तकाशी) के एक प्रतिष्ठित तीर्थ पुरोहित परिवार में हुआ था। हिमालयी संस्कृति में 'तीर्थ पुरोहित' का पद अत्यंत गरिमामय होता है, क्योंकि वे भगवान और भक्त के बीच की कड़ी माने जाते हैं। पोस्ती जी ने बचपन से ही वेदों, पुराणों और केदारखंड की धार्मिक परंपराओं को आत्मसात किया। उनके पूर्वजों ने पीढ़ियों से केदारनाथ धाम आने वाले यात्रियों का मार्गदर्शन किया था, और इसी विरासत को उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाया।
बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) में योगदान
श्रीनिवास पोस्ती के जीवन का एक बड़ा हिस्सा बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) की सेवा में बीता। वे केवल एक सदस्य नहीं थे, बल्कि नीति-निर्धारण में उनकी राय को पत्थर की लकीर माना जाता था।
राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व
पोस्ती जी की पहुंच केवल मंदिर की देहरी तक सीमित नहीं थी। वे समाज के हर वर्ग में लोकप्रिय थे। उन्होंने केदारनाथ नगर पंचायत के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। उनके कार्यकाल के दौरान केदारपुरी के बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण सुधार हुए। वे अक्सर स्थानीय लोगों की समस्याओं को सरकार के सामने मजबूती से रखते थे।
दिग्गजों के सारथी: नेहरू-गांधी परिवार से मोदी तक
केदारनाथ धाम आने वाले हर विशेष अतिथि के लिए श्रीनिवास पोस्ती एक भरोसेमंद नाम थे। उन्होंने देश के कई प्रधानमंत्रियों और वीआईपी को बाबा केदार के दर्शन कराए और विधि-विधान से पूजा संपन्न कराई:
2013 की त्रासदी और पुनर्निर्माण में भूमिका
जून 2013 की भीषण आपदा ने जब केदारनाथ को तहस-नहस कर दिया था, तब पोस्ती जी उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने हार नहीं मानी। उस संकट की घड़ी में उन्होंने न केवल तीर्थ पुरोहित समाज का ढांढस बंधाया, बल्कि मंदिर के भीतर पूजा की निरंतरता बनाए रखने के लिए सरकार और प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। 'केदारनाथ पुनर्निर्माण मास्टर प्लान' में उनके सुझावों को काफी अहमियत दी गई थी।
विवादों पर स्पष्ट मत: स्वर्ण मंडन और गर्भगृह
हाल के वर्षों में जब केदारनाथ मंदिर के गर्भगृह को स्वर्ण मंडित करने को लेकर विवाद उठा था, तब पोस्ती जी ने एक अनुभवी संरक्षक की तरह अपनी राय रखी। उनका मानना था कि दान और श्रद्धा का स्वागत होना चाहिए, लेकिन मंदिर की मूल संरचना और मर्यादा अक्षुण्ण रहनी चाहिए। वे पुरोहित समाज और सरकार के बीच एक सेतु का कार्य करते थे, जिससे बड़े से बड़े गतिरोध सुलझ जाते थे।
एक युग का अंत: 15 फरवरी 2026
फरवरी 2026 के मध्य में पूरा उत्तराखंड महाशिवरात्रि की तैयारी कर रहा था। केदारनाथ के कपाट खुलने की तिथि घोषित होने वाली थी। पोस्ती जी इसी पावन कार्य के लिए दिल्ली से अपने गांव वापस आए थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 15 फरवरी 2026 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनके जाने से केदारघाटी ने अपना एक अभिभावक खो दिया।
पोस्ती जी की विरासत
श्रीनिवास पोस्ती का व्यक्तित्व हमें सिखाता है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक समाज में बदलाव लाया जा सकता है। उन्होंने पुरोहित समाज को संगठित किया और यह सुनिश्चित किया कि आने वाली पीढ़ियां अपनी संस्कृति पर गर्व करें। आज जब श्रद्धालु केदारनाथ की चोटियों को देखते हैं, तो उन्हें उन पुरोहितों की याद जरूर आती है जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी इस धाम की ज्योत को जलाए रखा। श्रीनिवास पोस्ती उसी ज्योत के एक प्रखर प्रकाश पुंज थे।
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