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क्यों होती हैं भगवान विष्णु की पूजा
जानिए इस पवित्र महीने में किए गए जप-तप का महत्व
सनातन धर्म में अधिकमास को बेहद पुण्यदायी और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर समय माना जाता है। इसे पुरुषोत्तम मास और मलमास के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित होता है और इस दौरान की गई पूजा, दान, जप और व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।
हर तीन साल में एक बार आने वाला यह विशेष महीना भक्तों को आत्मशुद्धि, भक्ति और सेवा का अवसर देता है। धार्मिक ग्रंथों में अधिकमास को साधना और मोक्ष प्राप्ति का श्रेष्ठ काल बताया गया है।
क्यों कहा जाता है ‘पुरुषोत्तम मास’?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, साल के 12 महीनों के अलग-अलग देवता माने गए हैं, लेकिन जब अतिरिक्त महीने का समय आया तो उसका कोई स्वामी नहीं था। इस कारण वह उपेक्षित महसूस करने लगा और भगवान विष्णु की शरण में पहुंचा।
तब भगवान विष्णु ने उस महीने को अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान किया और आशीर्वाद दिया कि इस माह में जो भी श्रद्धा से पूजा-पाठ, दान और भक्ति करेगा, उसे अक्षय पुण्य प्राप्त होगा। तभी से अधिकमास को पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाने लगा।
भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस महीने में भगवान विष्णु की आराधना करने से जीवन में सुख-शांति और सकारात्मकता आती है। भक्त इस दौरान व्रत रखते हैं, कथा सुनते हैं और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
विशेष रूप से
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप
विष्णु सहस्रनाम का पाठ
गीता और भागवत कथा का श्रवण अत्यंत शुभ माना जाता है।
दान-पुण्य और सेवा का महीना
अधिकमास को दान और सेवा का महीना भी कहा जाता है। इस दौरान जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, अनाज और दक्षिणा देने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस समय किया गया दान कई जन्मों तक शुभ फल देता है।
आध्यात्मिक साधना का श्रेष्ठ समय
धर्माचार्यों के अनुसार, अधिकमास केवल पूजा-पाठ का समय नहीं बल्कि आत्मचिंतन और जीवन को सकारात्मक दिशा देने का अवसर भी है। यही कारण है कि इस महीने को सनातन परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है।
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