special-facts-about-...
नियति का पहिया और स्वाधीनता का सूर्य: महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर एक खास विश्लेषण
महात्मा गांधी
महात्मा गांधी की पुण्यतिथि मात्र एक शोक का दिन नहीं है, बल्कि यह उस विचार के पुनरावलोकन का दिन है जिसने एक बिखरते हुए राष्ट्र को 'स्वराज' के धागे में पिरोया था। इतिहास अक्सर राजाओं और युद्धों की कहानियों से भरा होता है, लेकिन भारत का इतिहास एक ऐसे 'साधारण' बैरिस्टर की कहानी है जिसे नियति ने अपमान की आग में तपाकर 'महात्मा' बना दिया। 30 जनवरी का दिन हमें याद दिलाता है कि एक दुबला-पतला इंसान, जिसके पास न कोई सेना थी न कोई आधुनिक हथियार, उसने दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य को केवल अपने आत्मबल और सत्य के प्रयोगों से घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। गांधी जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि संकल्प अडिग हो, तो नियति को भी अपना रास्ता बदलना पड़ता है।
अपमान से आत्म-बोध तक: पीटरमैरिट्सबर्ग का वह मोड़
इतिहास में एक प्रसिद्ध उक्ति है कि "क्या होता अगर...?"। यदि दक्षिण अफ्रीका के पीटरमैरिट्सबर्ग स्टेशन पर 7 जून 1893 की उस सर्द रात में मोहनदास करमचंद गांधी को प्रथम श्रेणी के डिब्बे से बाहर न फेंका गया होता, तो क्या आज का भारत ऐसा होता जैसा हम देखते हैं? शायद नहीं। वह अपमान केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं था, बल्कि वह उस औपनिवेशिक अहंकार की पराकाष्ठा थी जिसने नस्लवाद को अपना धर्म बना लिया था। कोर्ट में पगड़ी उतारने का आदेश देना हो या ट्रेन से बाहर फेंका जाना-इन घटनाओं ने गांधी के भीतर सोए हुए 'भारतीय स्वाभिमान' को जगा दिया। जैसा कि कहा जाता है, समय और भाग्य ने एक साधारण से शख्स को अहिंसा का पुजारी बना दिया, वो भी तब जब वह स्वयं चरम मानसिक हिंसा का शिकार हुआ।
आजादी के परवाने और औपनिवेशिक मानसिकता
आज जब हम स्वतंत्र भारत के खुले आकाश के नीचे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं, तो कई बार अनजाने में ही अपने पूर्वजों और नेताओं के संघर्ष को कमतर आंकने की भूल कर बैठते हैं। लेकिन विचार कीजिए, यदि वे 'आजादी के परवाने' अंग्रेजों की सत्ता से न टकराते, तो आज हमारी स्थिति क्या होती? संभवतः हम आज भी औपनिवेशिक दासता की बेड़ियों में जकड़े होते और अपनी प्रतिभा का उपयोग ब्रिटिश 'साहबों' और 'मैडमों' की सेवा में कर रहे होते। वे इलाके जहां आज भी पहुंचना कठिन है, वहां अंग्रेज रेल की पटरियां केवल इसलिए बिछा रहे होते ताकि वे भारत के संसाधनों का दोहन कर सकें, न कि जन-कल्याण के लिए। गांधी और उनके समकालीन नेताओं ने भारतीयों को 'नखरे उठाने' की मजबूरी से निकालकर 'अपना भाग्य स्वयं लिखने' की शक्ति दी।
विचारधाराओं का द्वंद्व: अहिंसा और शक्ति का संतुलन
इतिहास के गलियारों में अक्सर यह बहस होती है कि आजादी अहिंसा से मिली या सशस्त्र क्रांति से। सत्य यह है कि ये दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। गांधी जी की अहिंसा ने जहां आम जनता को जिसमें किसान, महिलाएं और मजदूर शामिल थे। आंदोलन से जोड़ा, वहीं क्रांतिकारियों के बलिदान ने अंग्रेजों के मन में यह भय पैदा किया कि अब भारत का युवा मौत से नहीं डरता।
इस महत्वपूर्ण अंश को समझना जरूरी है: "सिर्फ अहिंसा का गुणगान करने से दुश्मन छाती पर चढ़ आता है, तो हिंसा करने से राक्षसी प्रवृत्तियां घर कर जाती हैं।"
अंग्रेजों की सबसे बड़ी भूल
अंग्रेजों की सबसे बड़ी भूल 'फूट डालो और राज करो' की नीति के साथ-साथ भारतीयों के धैर्य की परीक्षा लेना था। उन्होंने सोचा कि हंटर और गोली के दम पर वे एक प्राचीन सभ्यता को दबा लेंगे। लेकिन जलियांवाला बाग जैसे नरसंहारों ने भारतीयों के भीतर उस 'कट्टर देशभक्ति' को जन्म दिया, जिसने फांसी के फंदों को फूलों का हार बना दिया।असहयोग आंदोलन और नमक सत्याग्रह ने ब्रिटिश अर्थव्यवस्था और उनके नैतिक आधार को हिला कर रख दिया। 15 अगस्त 1947 की सुबह उसी 'अहिंसा और प्रतिरोध के सटीक मिश्रण' का परिणाम थी।
गड़े मुर्दे और भविष्य की राह
आज के राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में अक्सर अतीत के फैसलों पर विवाद होता है। मतभेद लोकतंत्र की निशानी हैं। लक्ष्य सबका एक था-स्वतंत्र भारत।जैसा कि कहा गया है, "गड़े मुर्दे उखाड़ने से हवाओं में खुशबू नहीं फैलती।" आज जरूरत इस बात की है कि हम उन महापुरुषों के बलिदानों से सीख लें, न कि उनके बीच की वैचारिक भिन्नताओं को अपनी कट्टरता का हथियार बनाएं। गांधी जी की पुण्यतिथि पर सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम अहिंसा के नैतिक बल और अपनी राष्ट्रीय शक्ति (सामर्थ्य) के बीच एक ऐसा संतुलन बनाएं, जिससे भारत पुनः 'सोने की चिड़िया' और 'विश्व गुरु' बन सके।