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दुनिया अभी से ज्यादा बेहतर रहने की जगह बन जाएगी
एक दौर की कहानियों से सबक लेने की जरूरत
कहते हैं कि जिस दौर में अली बिन अबू तालिब अमीर-उल-मोमिनीन यानी खलीफा थे, उसी समय एक अमीरतरीन शख्स ने अपने तीन गुलामों के हक में वसीयत लिखी। वसीयत में दर्ज था कि मेरे एक गुलाम को मेरे मरने के बाद मेरी इकलौती बेटी, जिसकी गिनती उस वक़्त की सबसे हसीन-ज़हीन लड़कियों में होती थी, का हाथ और मेरी आधी जायदाद दे दी जाए; मेरे दूसरे गुलाम को मेरी बाकी आधी जायदाद दी जाए और मेरे तीसरे गुलाम को कत्ल कर दिया जाए।
इससे पहले कि वह शख़्स साफ तौर पर लिख पाता कि किस गुलाम को क्या दिया जाना है, उसके प्राण पखेरू उड़ गए। पहेली बनी यह वसीयत मामला सुलझाने की जगह उलझाती ज़्यादा थी। तीनों गुलाम कई दानिशमंदों, आलिमों और मुंसिफो से सलाह लेने गए, मगर हर जगह उन्हें मायूसी ही मिली। हर कोई एक ही बात कहता: “बिना नाम वाली इस वसीयत की पहेली हम नहीं सुलझा सकते।” सब तरफ़ से निराश होकर वे न्याय की अंतिम उम्मीद लिए खलीफा दरबार पहुंचे।
खलीफ के दरबार में नियुक्त मुंसिफो ने भी वही जवाब दिया जो अन्य दानिशवर दे चुके थे। मगर जब खलीफा अली को पता चला कि कोई ऐसी वसीयत आई है जिसकी पहेली को कोई नहीं सुलझा पाया, तो उन्होंने तीनों को अपने दरबार में बुलाया। अमीर-उल-मोमिनीन अली ने वसीयत खुद पढ़ी और पढ़कर कड़क आवाज़ में कहा, “वह शख़्स अजीब था जिसने यह वसीयत लिखी। वसीयत के रहस्य को उजागर करने के लिए लिखने वाले की कब्र खोदनी पड़ेगी और खुद उससे ही पूछना होगा कि आखिर वह क्या चाहता था।” फिर उन्होंने पहले गुलाम को बुलाकर कहा, “तुम जाकर अपने मालिक की कब्र खोदो और उसकी लाश लेकर यहां आओ।” पहले गुलाम ने बड़ी नरमी से कहा, “अमीर-उल-मोमिनीन, भले ही आप मुझे कत्ल कर दें या उस जायदाद से मुझे महरूम कर दें, मैं अपने मालिक की कब्र नहीं खोद सकता।”
अब खलीफा अली ने दूसरे गुलाम को बुलाकर कहा कि वह अपने मरहूम मालिक की कब्र खोदकर उसकी लाश ले आए। दूसरा गुलाम कब्र खोदने की नीयत से एक बारगी दरबार की दहलीज तक तो पहुंच गया, मगर वापस लौट आया और बोला, “अमीर-उल-मोमिनीन, मुआफ कीजिए यह काम मुझसे नहीं हो पाएगा।”
अब खलीफा अली ने तीसरे गुलाम को बुलाया और कहा, “वसीयत कुछ स्पष्ट नहीं कहती- जाओ, अपने मालिक की कब्र को खोदो और उसकी लाश लेकर फौरन मेरे पास लाओ।” यह सुनते ही तीसरा गुलाम चहक उठा और बोला, “अमीर-उल-मोमिनीन, मैं तो खुद भी यही सोच रहा था कि अपने नासमझ मालिक की कब्र खोद दूं और उसकी लाश को झकझोरकर पूछूं कि आखिरकार तू कहना क्या चाहता है।”
तीसरे गुलाम का यह जवाब सुनकर अली ने फ़ैसला सुनाया। पहले गुलाम को, जिसने कहा था, “भले ही कत्ल कर दें, पर मैं अपनी मालिक की कब्र नहीं खोदूँगा”, मालिक की इकलौती बेटी से निकाह करवा कर आधी जायदाद दे दी जाए। उस गुलाम को, जो कब्र खोदने के इरादे से दहलीज़ तक तो पहुँचा गया था किंतु वापस लौट कर बोला, मुआफ़ कीजिए अपने मालिक की कब्र खोदने का काम मुझ से नहीं हो पाएगा, मालिक की आधी जायदाद देकर रुखसत किया जाए। और तीसरे गुलाम, जिसने खुले मन से अपने नासमझ मालिक की कब्र खोदने की बात कही थी, को कत्ल करने का हुक्म दे दिया।
अली का पूरा दरबार फ़ैसला सुनते ही “मरहबा! मरहबा!” की आवाज़ से गूंज उठा।
मगर आज जब हम अपने आसपास की दुनिया देखते हैं और फैसले और उन जज्बातों के खिलाफ सब कुछ होते हुए पाते हैं, तो दिल मायूस हो जाता है- जब अपने मालिक, अपने देश, अपनी पार्टी की “कब्रें खोदने” वालों को नवाजा जाता है, और जो लोग अपने मालिक, अपने देश और अपनी पार्टी की कब्र खोदने से इंकार कर देते हैं उन्हें दंडित होते, परेशान होते देखते है, तो मन और भी उदास हो जाता है।
काश हमारे ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के दिलों में भी अली जैसा इंसाफ और वैसे ही जज्बात जाग उठे, तो शायद ये दुनियां अभी से ज़्यादा बेहतर रहने की जगह बन जाए।