behind-alcohol-prohi...
शराबबंदी से आगे, समझदारी की नीति जरूरी
Concept pic
शराबबंदी की मांग जब भी उठती है, उसके पीछे समाज की वास्तविक पीड़ा होती है। शराब स्वास्थ्य बिगाड़ती है, परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर करती है, घरेलू हिंसा और अपराध को बढ़ावा देती है और सबसे ज्यादा चोट अक्सर उन परिवारों को पहुंचाती है, जिनकी आमदनी पहले ही सीमित होती है।
लेकिन एक सवाल हमें ईमानदारी से पूछना चाहिए—क्या शराब की दुकान बंद कर देने से शराब की समस्या खत्म हो जाएगी?
क्या वह व्यक्ति, जो अपने दुख, तनाव, बेरोजगारी, अकेलेपन या निराशा से बचने के लिए शराब का सहारा लेता है, केवल प्रतिबंध लग जाने से अपनी आदत छोड़ देगा?
शायद नहीं।
क्योंकि शराब का सवाल केवल शराब का सवाल नहीं है। यह हमारे समाज की उन परिस्थितियों का सवाल है, जिनमें एक आदमी शाम होते-होते बोतल में अपना सुकून तलाशने लगता है।
शराब—अमीर की ‘ड्रिंक’, गरीब की ‘दारू’
हमारे समाज में शराब को लेकर एक अजीब दोहरा मापदंड है।
अमीर शराब पीता है तो उसे ‘ड्रिंक’ कहा जाता है। गरीब पीता है तो वह ‘दारूबाज’ कहलाता है।
महंगी शराब किसी आलीशान पार्टी की शान बढ़ाती है, लेकिन वही शराब जब किसी गरीब परिवार की रसोई में पहुंचती है तो घर का बजट बिगाड़ देती है।
यहां सवाल शराब की कीमत से ज्यादा उस कीमत को चुकाने वाले परिवार का है।
जिस व्यक्ति की आय इतनी है कि शराब पर खर्च करने के बाद भी उसके परिवार की शिक्षा, भोजन, स्वास्थ्य और बचत प्रभावित नहीं होती, उसकी स्थिति उस व्यक्ति से अलग है जिसकी सीमित कमाई का बड़ा हिस्सा शराब में चला जाता है।
गरीब की शराब केवल उसकी जेब खाली नहीं करती। कई बार वह पूरे परिवार की थाली छोटी कर देती है।
असली कीमत बोतल की नहीं, परिवार की होती है
शराब की दुकान पर बोतल की कीमत कुछ सौ रुपये हो सकती है, लेकिन उसके पीछे परिवार की कीमत कहीं ज्यादा होती है।
बच्चे की रुकी हुई फीस।
घर में कम होता राशन।
पत्नी की अधूरी जरूरतें।
बीमारी में दवा के लिए कम पड़ते पैसे।
और भविष्य के लिए बचाई गई रकम का खत्म हो जाना।
यही शराब की असली कीमत है।
इसलिए शराब पर नीति बनाते समय केवल शराब पीने वाले व्यक्ति को केंद्र में रखना पर्याप्त नहीं है। उसके परिवार को भी केंद्र में रखना होगा।
उसे केवल अपराधी समझने के बजाय यह समझना होगा कि उसकी आदत का नुकसान किसे हो रहा है और उसे इससे बाहर निकालने के लिए समाज और सरकार क्या कर सकते हैं।
क्या पूर्ण शराबबंदी ही समाधान है?
पूर्ण शराबबंदी सुनने में बेहद आकर्षक समाधान लगता है। लेकिन व्यवहार में इसके सामने कई चुनौतियां हैं।
जहां शराब की मांग बनी रहती है, वहां प्रतिबंध के बाद अवैध शराब, तस्करी और जहरीली शराब का खतरा पैदा हो सकता है। शराब के अवैध कारोबार से अपराध का नया तंत्र भी खड़ा हो सकता है।
इसलिए शराबबंदी पर बहस केवल ‘बंदी हो या न हो’ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
हमें यह भी देखना होगा कि शराब की उपलब्धता कैसे कम की जाए, अत्यधिक सेवन को कैसे रोका जाए और शराब की वजह से बर्बाद हो रहे परिवारों को कैसे बचाया जाए।
बिक्री के समय और स्थान पर कठोर नियंत्रण, नाबालिगों तक शराब की पहुंच रोकना, अत्यधिक सेवन को हतोत्साहित करना और नशामुक्ति सेवाओं को मजबूत करना जैसे उपाय इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
सरकार शराब से कमाए तो जिम्मेदारी भी उठाए
शराब को लेकर सरकार के सामने एक बड़ा विरोधाभास है।
एक ओर शराब को स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक बताया जाता है, दूसरी ओर शराब से मिलने वाला राजस्व सरकारी खजाने के लिए महत्वपूर्ण होता है।
तो सवाल उठना स्वाभाविक है—यदि शराब से सरकार कमाती है, तो शराब से पैदा होने वाली सामाजिक समस्या की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
शराब से मिलने वाले राजस्व का एक निश्चित हिस्सा नशामुक्ति केंद्रों, स्वास्थ्य सेवाओं, परामर्श और जन-जागरूकता पर खर्च किया जाना चाहिए।
ग्रामीण क्षेत्रों में नशामुक्ति की सुविधाएं बढ़नी चाहिए। शराब की लत से जूझ रहे व्यक्ति के साथ उसके परिवार को भी सहायता मिलनी चाहिए।
जिस समस्या से राजस्व मिल रहा है, उसके दुष्परिणामों से समाज को बचाना भी उसी व्यवस्था की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
सिर्फ ‘शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’ कहने से बात नहीं बनेगी
शराब के खिलाफ जागरूकता अभियान लंबे समय से चल रहे हैं।
लेकिन क्या केवल पोस्टर लगा देने और विज्ञापन दिखा देने से कोई व्यक्ति शराब छोड़ देता है?
शराब पीने वाला व्यक्ति जानता है कि शराब नुकसान करती है।
उसे यह समझाने की जरूरत है कि महीने में शराब पर खर्च होने वाली रकम उसके बच्चे की फीस में बदल सकती है। घर के राशन में बदल सकती है। दवा में बदल सकती है। बचत में बदल सकती है।
उसे यह दिखाना होगा कि शराब छोड़ने के बाद उसकी जिंदगी में क्या बदल सकता है।
जन-जागरण डर पैदा करने वाला नहीं, बेहतर जीवन का रास्ता दिखाने वाला होना चाहिए।
शराब खुशी की पहचान क्यों बन गई?
शराब की समस्या केवल गरीबों तक सीमित नहीं है। उसका सामाजिक विस्तार भी चिंता का विषय है।
शादी हो, जन्मदिन हो, सफलता का जश्न हो या कोई पार्टी—कई जगह शराब को खुशी का अनिवार्य हिस्सा मान लिया गया है।
शराब न हो तो समारोह अधूरा और शराब हो तो आधुनिकता!
आखिर क्यों?
क्या खुशी मनाने के लिए नशा जरूरी है?
क्या किसी उत्सव की गरिमा इस बात से तय होगी कि मेज पर कितनी बोतलें रखी हैं?
हमें इस मानसिकता पर भी सवाल उठाना होगा।
जब तक शराब सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बनी रहेगी, तब तक केवल कानून के भरोसे शराब की समस्या से लड़ना मुश्किल होगा।
शराब से ज्यादा जरूरी है वह आदमी
शराब के खिलाफ अभियान कहीं शराब पीने वाले व्यक्ति के खिलाफ अभियान न बन जाए, इसका भी ध्यान रखना होगा।
वह व्यक्ति भी इसी समाज का हिस्सा है।
अगर वह बेरोजगार है तो उसे रोजगार चाहिए।
अगर वह तनाव में है तो उसे परामर्श चाहिए।
अगर वह अकेला है तो उसे सामाजिक सहारा चाहिए।
अगर वह आर्थिक संकट में है तो उसे अवसर चाहिए।
किसी के हाथ से बोतल छीनना आसान है, लेकिन उसके हाथ में बेहतर जिंदगी देना कठिन।
और वास्तविक समाधान वहीं से शुरू होगा।
हमें शराब नहीं, परिस्थितियां बदलनी होंगी
शराबबंदी का सवाल उठाने से पहले हमें यह तय करना होगा कि हमारा लक्ष्य क्या है।
क्या हमारा लक्ष्य केवल शराब की बोतलों की संख्या कम करना है?
या हमारा लक्ष्य उन परिवारों को बचाना है, जिनकी खुशियां शराब की वजह से धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं?
यदि लक्ष्य परिवार बचाना है तो नीति भी परिवार-केंद्रित होनी चाहिए।
शराब की बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण हो। नशामुक्ति सेवाओं का विस्तार हो। परिवारों को परामर्श मिले। कमजोर आर्थिक वर्गों के लिए विशेष सुरक्षा उपाय किए जाएं। शराब से मिलने वाले राजस्व का एक बड़ा हिस्सा उसी समस्या से लड़ने में लगाया जाए।
और सबसे जरूरी-शराब को सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बनाने वाली मानसिकता बदली जाए।
क्योंकि असली लड़ाई शराब की बोतल से नहीं है।
लड़ाई उस मजबूरी से है जो आदमी को बोतल तक ले जाती है।
हम चांद तक पहुंच चुके हैं। अब जरूरत उस आदमी तक पहुंचने की है जो हर शाम अपने दुखों से बचने के लिए शराब की दुकान तक पहुंचता है।
उसकी बोतल छीनने से पहले उसका दुख समझना होगा।
उसकी शराब रोकने से पहले उसकी मजबूरी रोकनी होगी।
और वह दिन सबसे बड़ी जीत का दिन होगा, जब कोई व्यक्ति शराब की दुकान के सामने से गुजरते हुए अपनी जेब टटोले और खुद से कहे—
“इन पैसों से आज शराब नहीं, अपने बच्चे का भविष्य खरीदूंगा।”
उस दिन शराबबंदी की नहीं,
इंसान की जीत होगी।
Disclaimer: हरीश भट्ट वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, ब्लॉगर हैं, इस लेख में पूरी तरह उनके विचार हैं...
यह भी पढ़ें