Thursday, 16 April 2026

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पयस्विनी गौशाला स्वावलंबन परियोजना

डॉ. चंद्र शेखर की अलौकिक दृष्टि

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पयवस्वनी गाैशाला

पयस्विनी गौशाला स्वावलंबन परियोजना : डॉ. चंद्र शेखर की अलौकिक दृष्टि

भारत की धरती पर गाय मात्र पशु नहीं, वरन हमारी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण का अद्वितीय त्रिवेणी स्रोत है। राजस्थान की मरुभूमि में जब भी पशुपालन की चर्चा होती है, वहाँ डॉ. चंद्र शेखर जैसे मनीषी का नाम आदरपूर्वक लिया जाता है। जिन्होंने विज्ञान, परंपरा और संवेदना को जोड़कर ‘पयस्विनी गौशाला स्वावलंबन परियोजना’ के रूप में एक जीवंत प्रयोग खड़ा किया है।

यह सम्पादकीय लेख डॉ. शेखर के इस अभिनव प्रयास का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो न केवल राजस्थान बल्कि संपूर्ण भारत के किसान-गोपालकों के लिए एक दिशासूचक मार्ग है।

डा. चंद्र शेखर-वैज्ञानिक दृष्टि और करुणा का संगम

डा. चंद्र शेखर, सुवंत सॉल्यूशन्स प्राइवेट लिमिटेड, जयपुर के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। उन्होंने पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय, बीकानेर से स्नातक तथा IVRI, बरेली से पशु पोषण में एम.वी.एससी. प्राप्त की। उनका शैक्षणिक और व्यावहारिक अनुभव 17 वर्षों से अधिक का है, जिसमें उन्होंने भारत और दक्षिण एशिया में पशु स्वास्थ्य और डेयरी व्यवसाय प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट है। हर गौशाला आत्मनिर्भर बने और हर गाय फिर से उपयोगी बने।

आर्थिक प्रभाव : आंकड़ों की भाषा में सफलता

राजस्थान, महाराष्ट्र और भीलवाड़ा के पायलट प्रोजेक्ट्स में इस कार्यक्रम से प्रति गाय ₹60,000 से ₹70,000 तक का प्रत्यक्ष लाभ दर्ज किया गया। बांझ गायों में गर्भधारण की सफलता दर 72% से 75% रही। औसतन 1 लीटर दूध उत्पादन में वृद्धि हुई, जिससे प्रति पशु मासिक ₹7,500 का अतिरिक्त लाभ हुआ। यदि इसे 100 गायों की औसत गौशाला पर लागू किया जाए, तो वार्षिक आय में लगभग ₹9 लाख की वृद्धि संभव है।

सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव

इस परियोजना ने ग्रामीण भारत के सामाजिक ढांचे को भी गहराई से प्रभावित किया है। जहाँ पहले बेसहारा गायें सड़कों पर दुर्घटनाओं और कचरे का कारण बनती थीं, अब वे गौशालाओं में पोषित होकर पुनः उत्पादक बन रही हैं। महिलाएँ इस प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। वे डेयरी प्रबंधन, पोषण और देखभाल में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। पयस्विनी मॉडल न केवल जीवदया का प्रतीक है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करता है। एक कमजोर गाय को स्वस्थ बनाकर पुनः दुग्ध उत्पादन योग्य बनाना। यही इस परियोजना की आत्मा है।

मुख्य डाटा आधारित निष्कर्ष

• 70 दिनों में 68 किलोग्राम औसतन वजन वृद्धि।

• 75% तक गर्भधारण सफलता दर।

• दूध उत्पादन में औसतन 1-3 लीटर प्रतिदिन वृद्धि।

• प्रति गाय ₹60,000-₹70,000 का आर्थिक लाभ।

• महाराष्ट्र और राजस्थान के 20 से अधिक गौशालाओं में सफल कार्यान्वयन।

डाॅ. शेखर का दृष्टिकोण “हर गौशाला बने जीवित विश्वविद्यालय”

डा. शेखर का मानना है कि गौशाला केवल दान और सेवा का स्थल नहीं, बल्कि एक जीवंत विश्वविद्यालय है। जहां विज्ञान, संवेदना और स्वावलंबन का संगम होता है। उन्होंने दिखाया कि यदि पशुपालन को वैज्ञानिक और आर्थिक दृष्टि से अपनाया जाए, तो यह न केवल किसानों की आय बढ़ा सकता है बल्कि पर्यावरण और समाज दोनों को सशक्त बना सकता है।

निष्कर्ष-आत्मनिर्भर भारत की ओर एक कदम

‘पयस्विनी गौशाला स्वावलंबन परियोजना’ भारतीय ग्राम्य जीवन के पुनर्जागरण की दिशा में एक क्रांतिकारी प्रयोग है। डा. चंद्र शेखर की यह सोच आधुनिक भारत के ‘गौ आधारित सतत् विकास मॉडल’ का जीवंत उदाहरण है। राजस्थान के किसान, गोपालक और समाजसेवी यदि इस मॉडल को अपनाएँ, तो आने वाले दशक में गौशालाएं न केवल आत्मनिर्भर होंगी, बल्कि पूरे प्रदेश की जैविक अर्थव्यवस्था का केंद्र बनेंगी।

॥ मा गोः हिंस्यान्वितः सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥

गाय के कल्याण में ही मानवता की समृद्धि निहित है।

मिशन लोड कार्यक्रम-विज्ञान और संवेदना का संगम

‘मिशन लोड’ कार्यक्रम डॉ. शेखर का सबसे प्रशंसनीय प्रयोग है, जिसमें कमजोर बछड़ों के विकास, गर्भधारण की आयु घटाने, और दूध उत्पादन में वृद्धि के लिये वैज्ञानिक पोषण और स्वास्थ्य देखभाल का समावेश किया गया है। डाटा के अनुसार, 70 दिनों में बछड़ों का औसतन वजन 32 किलो से 100 किलो तक पहुंचा-अर्थात 68 किलो की वृद्धि। इस वैज्ञानिक हस्तक्षेप से 1.5 वर्ष की आयु में ही बछड़ियां गर्भधारण करने योग्य बनती हैं, जबकि पारंपरिक विधि में यह 3-4 वर्ष लगते हैं। यह सुधार न केवल समय की बचत है बल्कि किसान के लिए आय का त्वरित स्रोत भी है।




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