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'अग्नि परीक्षा' के समान होता है एक आर्यिका का जीवन
आर्यिका पूर्णमति माताजी ऋषिकेश प्रवास पर
''जो प्राप्त है वही पर्याप्त है, अपने बच्चों को 'कार' नहीं संस्कार दीजिए'' ये कहना है आर्यिका पूर्णमति माताजी का। आर्यिका पूर्णमति माताजी की ओजस्वी वाणी जहां एक ओर जिनवाणी के गूढतम रहस्यों का रसास्वादन कराती है वहीं अपनी मधुरता से भव्यजीवों के कानों में अमृत का संचार करती है। पूर्णमति माताजी इन दिनों उत्तराखंड में योग नगरी ऋषिकेश में प्रवास पर हैं। जैन धर्म में दिगंबर आर्यिका (साध्वी) मुनियों के समान ही उच्च संयमी जीवन जीती हैं, लेकिन वे एक श्वेत साड़ी (पिच्छी-कमण्डलु के साथ) धारण करती हैं। वे दिगंबर साधु की शिष्या होती हैं, जो महाव्रत, तपस्या और सल्लेखना का पालन करती हैं। वे करपात्र (हाथ में) से एक बार ही भोजन ग्रहण करती हैं। जैन धर्म की दिगंबर परंपरा विश्व की प्राचीनतम श्रमण संस्कृतियों में से एक है। यहाँ 'अपरिग्रह' (त्याग) और 'अहिंसा' केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति हैं। इस पद्धति को पूर्णता प्रदान करती है आर्यिका परंपरा। जब एक नारी अपनी सांसारिक मोह-माया का विसर्जन कर आत्म-कल्याण के मार्ग पर बढ़ती है, तो वह 'आर्यिका' कहलाती है। आधुनिक युग में इस कठिन मार्ग की जीवंत उदाहरण गणिनी आर्यिका 105 पूर्णमति माताजी हैं।
‘वीणा के बाल मन में उठी, जब विद्या से पूर्ण होने की तरंगे’
राजस्थान प्रांत के डूंगरपुर ग्राम की वसुंधरा उस समय धन्य हो गई, जब अक्षय तृतीया के पावन दिवस उसके आंगन में एक नन्हीं सी ‘वीणा’ के सुमधुर स्वर की झंकार गूँज उठी। श्रावक श्रेष्ठी श्रीमान अमृतलाल जी जैन (समाधिस्थ मुनि श्री हेमंत सागर जी महाराज) के घर उनकी धर्मपत्नी धर्मनिष्ठ माता रुकमणी देवी के गर्भ से वैशाख शुक्ल तीज, संवत् २०२१, गुरुवार १४ मई १९६४ की शुभ प्रभात बेला में पुत्री ‘वीणा’ का जन्म हुआ। कौन जानता था मात्र हायर सेकेंडरी तक की लौकिक शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करने वाली भैया राजेन्द्र, अशोक और अकलंक की दुलारी भगिनी एक दिन संपूर्ण लोक की ही परिभाषा को समझने वाली निष्णांत ज्ञाता बन जाएगी।
महज 6 वर्ष की आयु में ही आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत के संकल्प से दृढ़ संकल्पित ‘वीणा’ के बाल मन में संसार की असारता को समझने और सच्चे गुरु की खोज की ललक हिलौरे खाने लगी, और यह खोज पूर्ण हुई श्रमण कुलश्रेष्ठ आत्मविद्या के धनी, जीवन्त मूलाचार व समयसार की प्रतिकृति, निरंतर अर्धशती से साधना पथ पर अविरल बढ़ते पथिक, विश्व के अद्वितीय संत, धरती के देवता आचार्य श्री विद्यासागर जी के रूप में! बस फिर क्या था, जैसे हजारों वर्षों से प्यासे चातक को अमृत का सरोवर मिल गया हो और वहीं से ‘वीणा ने विद्या से पूर्ण’ होने का भाव प्रकट कर दिया।
समाज को दिखाई जीवन की सच्ची राह
समाज सुधार की दिशा मे माता जी ने संगोष्ठियाँ, युवा सम्मेलन, महिला सम्मेलन, जनक-जननी सम्मान और बाल संस्कार शिविर जैसे विभिन्न माध्यमों से जिनागम के श्रुत संवर्धन का कार्य किया गया है, तो वहीं दूसरी ओर जेल में जाकर वहाँ के कैदियों के बीच अपने गुरु उपदेशों के प्रवचनांश सुनाएं हैं। उनके परिणामों में परिवर्तन कर उन्हें जीवन की सच्ची राह दिखाने की पहल की है।
ऐतिहासिक विरोध और कीर्तिमान: माताजी की प्रेरणा से ललितपुर के १२ हजार से अधिक जैन युवाओं ने 'संथारा' पर प्रतिबंध के विरोध में सामूहिक मुंडन करवाकर एक नया उदाहरण पेश किया, जो 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में दर्ज हुआ।
आध्यात्मिक प्रभाव: उनके मार्गदर्शन में अब तक ४० से अधिक जिज्ञासुओं ने संसार त्याग कर दीक्षा ग्रहण की और साधना का मार्ग चुना है।
विशाल पद विहार: अपने दीक्षा काल में उन्होंने लगभग ५० हजार किलोमीटर से अधिक की पैदल यात्रा (पद विहार) की है, जिसमें राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के सुदूर गांवों से लेकर शहरों तक धर्म की अलख जगाई है।
तीर्थ वंदना और संस्कार: माताजी ने सम्मेद शिखरजी और श्रवणबेलगोला जैसे प्रमुख तीर्थों की वंदना करने के साथ-साथ जनमानस को नैतिक मूल्यों और गुरु देशना से जोड़ा है।
जैन धर्म में 'आर्यिका' बनने की क्रमबद्ध प्रक्रिया
जैन धर्म में नारी जीवन की सर्वोच्च अवस्था आर्यिका पद है। यह रातों-रात प्राप्त होने वाली पदवी नहीं है, बल्कि वर्षों के अभ्यास और चारित्रिक शुद्धिकरण का परिणाम है।
प्रारंभिक भूमिका: जिज्ञासु और श्राविका
दीक्षा की यात्रा 'सम्यक दर्शन' (सही दृष्टि) से शुरू होती है।
• अष्ट मूल गुण: सर्वप्रथम मद्य, मांस, मधु और पांच उदंबर फलों का आजीवन त्याग करना अनिवार्य है।
• 11 प्रतिमाएं: एक महिला धीरे-धीरे श्रावक धर्म की ११ सीढ़ियाँ चढ़ती है, जिसमें वह रात्रि भोजन त्याग, ब्रह्मचर्य और अंततः घर का त्याग (क्षुल्लिका बनने से पहले) करती है।
ब्रह्मचर्य अवस्था और परीक्षण
दीक्षा के इच्छुक अभ्यर्थी को 'ब्रह्मचारिणी' के रूप में गुरु के संघ में रहना पड़ता है। यहाँ गुरु यह देखते हैं कि क्या शिष्या की शारीरिक और मानसिक क्षमता इतनी प्रबल है कि वह सर्दी, गर्मी, भूख और प्यास (बाईस परीषह) को सहन कर सके?
क्षल्लिका दीक्षा (संयम का प्रथम सोपान)
यह पूर्ण दीक्षा से पहले की सीढ़ी है।
• वेशभूषा: क्षल्लिका जी केवल दो सफेद वस्त्र धारण करती हैं।
• दीक्षा विधि: गुरु मंत्र देते हैं और शिष्या के केशों का 'लोच' (हाथों से बाल उखाड़ना) किया जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि अब उसे अपने शरीर और सुंदरता से कोई मोह नहीं रहा।
पूर्ण आर्यिका दीक्षा (महान प्रव्रज्या)
जब वैराग्य चरम पर होता है, तब पूर्ण दीक्षा दी जाती है। इस दिन शिष्या का नया जन्म होता है और उसे एक नया नाम दिया जाता है (जैसे उमा जी से पूर्णमति माताजी)।
आर्यिका के अनिवार्य उपकरण:
• पिच्छी: मोर के गिरे हुए पंखों से बनी, जिसका उपयोग सूक्ष्म जीवों को हटाने के लिए किया जाता है।
• कमंडल: शारीरिक शुद्धि (शौच) के लिए लकड़ी या धातु का जल पात्र।
• शास्त्र: निरंतर ज्ञानार्जन के लिए जैन आगम।
आर्यिका की कठिन चर्या और नियम
दीक्षा के बाद एक आर्यिका का जीवन 'अग्नि परीक्षा' के समान होता है। उनके लिए नियम अटल होते हैं:
आहार चर्या
आर्यिका माताजी दिन में केवल एक बार आहार ग्रहण करती हैं। वे सूर्यास्त के बाद अन्न या जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करतीं। आहार ग्रहण करने की विधि भी विशेष है; वे श्रावक के यहाँ जाकर शुद्ध, प्रासुक (उबला हुआ) भोजन ग्रहण करती हैं, जो पूरी तरह अहिंसक और सात्विक होता है।
पदविहार (पैदल यात्रा)
जैन साधु-साध्वियाँ किसी भी वाहन (कार, ट्रेन, प्लेन) का उपयोग नहीं करते। पूर्णमति माताजी ने हजारों किलोमीटर की यात्रा नंगे पैर पैदल चलकर की है। चाहे तपती धूप हो या कड़कड़ाती ठंड, उनके पैर कभी नहीं रुकते।
केशलोंच
हर 2, 3 या 4 महीने में आर्यिकाएं अपने सिर के बाल हाथों से उखाड़ती हैं। यह अत्यंत कष्टदायक प्रक्रिया है, लेकिन वे इसे बिना किसी शिकन के, समता भाव से पूर्ण करती हैं ताकि अहिंसा का पालन हो सके (क्योंकि उस्तरे या कैंची से सूक्ष्म जीवों की हत्या की संभावना रहती है)।
समाज और राष्ट्र निर्माण में योगदान
पूर्णमति माताजी केवल एक साध्वी नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक क्रांति की सूत्रधार हैं।
• साहित्यिक सृजन: उन्होंने प्राकृत और संस्कृत के कठिन सूत्रों का हिंदी अनुवाद किया है ताकि सामान्य जन भी धर्म को समझ सकें।
• संस्कार और शिक्षा: वे युवाओं को 'भारतीय संस्कृति' से जुड़ने की प्रेरणा देती हैं। उनके प्रवचनों का मुख्य केंद्र 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और 'व्यसन मुक्ति' होता है।
• गौ-सेवा: माताजी के उपदेशों से प्रेरित होकर कई स्थानों पर गौशालाओं का निर्माण हुआ है, जहाँ कसाईखानों से बचाई गई गायों की सेवा की जाती है।
गणिनी आर्यिका 105 पूर्णमति माताजी का जीवन आधुनिक युग के लिए एक संदेश है कि सुख सुविधाओं में नहीं, बल्कि त्याग में है। उनकी आर्यिका बनने तक की यात्रा और उसके बाद की कठिन साधना हमें सिखाती है कि आत्म-विश्वास और गुरु-भक्ति से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
आज जब समाज पाश्चात्य संस्कृति की ओर भाग रहा है, ऐसे समय में माताजी जैसी महान विभूतियां हमें हमारी जड़ों (भारतीय संस्कृति और जैन दर्शन) की ओर लौटने का मार्ग दिखाती हैं। उनका ससंघ विहार जहाँ-जहां होता है, वहां धर्म की गंगा प्रवाहित होती है और मानवता का कल्याण होता है।
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